अरावली बचाओ
प्रकृति की धरोहर, हमारी ज़िम्मेदारी
अरावली क्यों ज़रूरी है?
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है। यह केवल पहाड़ नहीं, बल्कि राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली की जीवनरेखा है।
- मरुस्थलीकरण को रोकती है
- भूजल स्तर बनाए रखती है
- जैव-विविधता (वन्यजीव, पेड़-पौधे) की रक्षा करती है
- प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करती है
अरावली पर्वतमाला – जो उत्तर भारत की सांसों की डोर है और हमारी प्यास बुझाने वाली जल-सुरक्षा की रीढ़ है – उसका आज धीरे-धीरे, तिल-तिल कर गला घोंटा जा रहा है।
“विकास” के नाम पर पहाड़ों का सीना चीरने, हरे-भरे जंगलों को रौंदने और कुदरत का सौदा करने की यह जो वहशी मानसिकता है, इसकी शुरुआत दशकों पहले हो गई थी।
दुर्भाग्य देखिए कि वैज्ञानिकों की चीखती चेतावनियों के बावजूद, आज भी वही विनाशकारी खेल बदस्तूर जारी है। अरावली महज ज़मीन का एक टुकड़ा या पत्थरों का ढेर नहीं है।
यह इस धरती के सबसे बुज़ुर्ग अभिभावकों में से एक है, हिमालय से भी प्राचीन… जो अरबों सालों से, एक मूक प्रहरी की तरह, चुपचाप करोड़ों जिंदगियों की रक्षा करती आ रही है।
यह बादलों को रोककर पानी बरसाती है, जंगलों में जान फूंकती है, बेजुबानों को आश्रय देती है और रेगिस्तान को हमारे शहरों को निगलने से रोकने वाली एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ी है। लेकिन आज… इन प्राचीन पहाड़ियों का शरीर नोचा जा रहा है, उन्हें बारूद से उड़ाया जा रहा है, समतल किया जा रहा है और कंक्रीट की कब्रों के नीचे दफनाया जा रहा है। जंगल मिट रहे हैं। पाताल का पानी सूख रहा है। जानवर बेघर हो रहे हैं।
और अरावली की हर एक चट्टान के टूटने के साथ… हमारे बच्चों का भविष्य और कमज़ोर होता जा रहा है। यह ‘प्रगति’ नहीं है। यह पर्यावरण की हत्या है।
यह एक धीमी मौत की सज़ा है। जैसे किसी पवित्र धरोहर का चीरहरण किया जा रहा हो, अरावली अपनी चमक, अपनी ताकत और अपना मकसद खो रही है – हमारी आज और आने वाली पीढ़ियों को ऐसा घाव दे रही है जो शायद कभी नहीं भरेगा।याद रखिएगा, जिस दिन अरावली ढह गई, वह नहीं रोएगी…
लेकिन करोड़ों इंसान खून के आंसू रोएंगे। अरावली को बचाना सिर्फ एक ‘पर्यावरण का विकल्प’ नहीं है –
यह हमारे ज़िंदा रहने की शर्त है। यह अस्तित्व की लड़ाई है।